अभियक्ति की आजादी जूता भी नही ??
भारत मे आजादी का बड़ा महत्तव है कियोकी इस आजादी के लिए ना जाने कितने महान पुरशो ने अपने जान को न्योछावर कर दिया है , तब जाकर आज हम आजादी के रूप मे मना रहे है लेकिन इस आजादी के आड़ मे व्यक्ति की अभियक्ति जूता बन जाय जिसे वहा जब चाहे वह पैर मे पहनने के बजाय हाथ मे लेकर सभा मंच पर बैठे महानुभाव की तरफ उछाल दे ,अब यह एक जनसमुदाय के लिए बड़ा ही सोचनीय विषय बन गया है !
भारत देश ने अपनी आजादी की लडाई की शुरवात के समय भी इस तरह के अभियक्ति का कभी भी उपयोग नही किया गया, जबकि उस दौर मे शिर्फ़ धरना प्रदर्शन ,काली पट्टी , भूख हड़ताल ,यानी की अहिंसा का सदा ही मार्ग अपनाया गया था! आज समय के बदलाव के साथ इस दौर में काफी बदलाव देखा जा रहा है हर जगह विरोध का तरीका बदलने जैसा हो गया है !राजनितिक पार्टिया से लेकर विभिन्न सरकारी संगठन के लोग भी अहिंसा के बदले हिंसा का मार्ग सुलभ समझ रहे है ! न जाने कितने उदाहरण देखन व सुनने को मिल जाते है की उस आदोलन में इतने लोग घायल हुए है, और कुछ एक लोग की भागदौड़ में कुचलने से मृत्रू हो गयी है !सार्वजिनक स्थल से लेकर सरकारी विभागों के कार्यो में जोर शोरे से हिंसा की प्रतिक्रिया का रूप सामने देखने को मिलता है !
भारतीय समाज का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन हुआ है ! अब कलम की ताकत को कुछ लोग फीका समझ कर अपने अभियक्ति का प्रदर्शन जूता के माद्यम से करने लगे है !अभी कुछ समय पहले की बात है की नई दिल्ही में कांगेश कार्यालय में मेदोइय प्रभारी के प्रमुख जनार्दन दिवेदी सावंदाताओ को संबोधित कर रहे थे की तभी एक पत्रकार महानुभाव ने अपने सवाल के जवाब से असंतुस्थ होकर जूता निकालकर मंच पर पहुच गये हलाकि सुरक्षा विभाग ने मौके की नजाकत को भापते हुए तुरंत पत्रकार महोदय को सभा से बाहर कर दिया ! इसी तरह ७ अप्रैल २००९ को पत्रकार जनरैल सिंह ने भी पी चिदम्बरण
के प्रेष सभा में उनके उपर उछाला था .बहरहाल यह जूता उछालने की शुरवात भारत में ही नही विदेशो में भी देखा गया है ! अमेरिका के राष्टपति जौज बुश पर भी फेका गया था ! अब इन पत्रकारों को पकडे जाने पर इनके पीछे लगे मीडिया कंपनी अपना हाथ पीछे खीच लेती है और कहती है की वह हमारा साव्व्दाता है ही नही जिससे यह पूरा पकरण कुछ दिन बाद मामूली बन जाता है और समाप्त हो जाता है !
समाज का चौथा स्तंभ कहा जाने वाली पत्रकरिता को कहे या इसकी आड़ में पत्रकार महोदय को संबोधित किया जाय,क्या यह शोभा देती है की समाज में लोगो को जागरूक करने के बजाय इस तरह के असभ्य व निदनीय कार्यो को अपने अभिव्यक्ति का माद्यम बनाकर पत्रकारिता क्षेत्र के महानुभाव को शर्मसार कर दिया जाय ! मीडिया हमेशा एक माद्यम बनने का कार्य करती है न की उस कार्य का सम्पूर्ण रूप बनती है !पत्रकारिता समाज को सच्चाई परोसने का काम करती है न की उस पर अपना फैसला सुनाती है !
पत्रकारिता क्षेत्र में कुछ नये यूवा पत्रकार शायेद कुछ जय्दा उत्तेजिक व भावुक हो जाते है जो पत्रकारिता के सही माप दंड को भुला बैठेते है और कलम की ताकत को अभिव्यक्ति बनने के बजाय जूता को अपना सरल माद्यम बना लेते है और इसी अंदाज को पूरा करने की कोशिश में यह शर्मसार कार्य को अंजाम दे बैठते है और खुद को फेमस बनाने के चक्कर में जेल की हवा खानी पड़ती है अब तो इन कार्यो से हर प्रेस कांप्रेंस में अब चुनिदा पत्रकार व मीडिया ही जा सकती है क्योकि न जाने पत्रकार के भेष भूसा में कोई भी एक गम्भीर घटना को अंजाम दे सकता है इसलिए आगामी समय में अब मीडिया हाउस को अपने यहा इस तरह के पत्रकारों को रखने से पहले काफी जानकारी व अनुभव का ज्ञान रखना हो गा !
पंकज दुबे( पत्रकार )
भारत मे आजादी का बड़ा महत्तव है कियोकी इस आजादी के लिए ना जाने कितने महान पुरशो ने अपने जान को न्योछावर कर दिया है , तब जाकर आज हम आजादी के रूप मे मना रहे है लेकिन इस आजादी के आड़ मे व्यक्ति की अभियक्ति जूता बन जाय जिसे वहा जब चाहे वह पैर मे पहनने के बजाय हाथ मे लेकर सभा मंच पर बैठे महानुभाव की तरफ उछाल दे ,अब यह एक जनसमुदाय के लिए बड़ा ही सोचनीय विषय बन गया है !
भारत देश ने अपनी आजादी की लडाई की शुरवात के समय भी इस तरह के अभियक्ति का कभी भी उपयोग नही किया गया, जबकि उस दौर मे शिर्फ़ धरना प्रदर्शन ,काली पट्टी , भूख हड़ताल ,यानी की अहिंसा का सदा ही मार्ग अपनाया गया था! आज समय के बदलाव के साथ इस दौर में काफी बदलाव देखा जा रहा है हर जगह विरोध का तरीका बदलने जैसा हो गया है !राजनितिक पार्टिया से लेकर विभिन्न सरकारी संगठन के लोग भी अहिंसा के बदले हिंसा का मार्ग सुलभ समझ रहे है ! न जाने कितने उदाहरण देखन व सुनने को मिल जाते है की उस आदोलन में इतने लोग घायल हुए है, और कुछ एक लोग की भागदौड़ में कुचलने से मृत्रू हो गयी है !सार्वजिनक स्थल से लेकर सरकारी विभागों के कार्यो में जोर शोरे से हिंसा की प्रतिक्रिया का रूप सामने देखने को मिलता है !
भारतीय समाज का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन हुआ है ! अब कलम की ताकत को कुछ लोग फीका समझ कर अपने अभियक्ति का प्रदर्शन जूता के माद्यम से करने लगे है !अभी कुछ समय पहले की बात है की नई दिल्ही में कांगेश कार्यालय में मेदोइय प्रभारी के प्रमुख जनार्दन दिवेदी सावंदाताओ को संबोधित कर रहे थे की तभी एक पत्रकार महानुभाव ने अपने सवाल के जवाब से असंतुस्थ होकर जूता निकालकर मंच पर पहुच गये हलाकि सुरक्षा विभाग ने मौके की नजाकत को भापते हुए तुरंत पत्रकार महोदय को सभा से बाहर कर दिया ! इसी तरह ७ अप्रैल २००९ को पत्रकार जनरैल सिंह ने भी पी चिदम्बरण
के प्रेष सभा में उनके उपर उछाला था .बहरहाल यह जूता उछालने की शुरवात भारत में ही नही विदेशो में भी देखा गया है ! अमेरिका के राष्टपति जौज बुश पर भी फेका गया था ! अब इन पत्रकारों को पकडे जाने पर इनके पीछे लगे मीडिया कंपनी अपना हाथ पीछे खीच लेती है और कहती है की वह हमारा साव्व्दाता है ही नही जिससे यह पूरा पकरण कुछ दिन बाद मामूली बन जाता है और समाप्त हो जाता है !
समाज का चौथा स्तंभ कहा जाने वाली पत्रकरिता को कहे या इसकी आड़ में पत्रकार महोदय को संबोधित किया जाय,क्या यह शोभा देती है की समाज में लोगो को जागरूक करने के बजाय इस तरह के असभ्य व निदनीय कार्यो को अपने अभिव्यक्ति का माद्यम बनाकर पत्रकारिता क्षेत्र के महानुभाव को शर्मसार कर दिया जाय ! मीडिया हमेशा एक माद्यम बनने का कार्य करती है न की उस कार्य का सम्पूर्ण रूप बनती है !पत्रकारिता समाज को सच्चाई परोसने का काम करती है न की उस पर अपना फैसला सुनाती है !
पत्रकारिता क्षेत्र में कुछ नये यूवा पत्रकार शायेद कुछ जय्दा उत्तेजिक व भावुक हो जाते है जो पत्रकारिता के सही माप दंड को भुला बैठेते है और कलम की ताकत को अभिव्यक्ति बनने के बजाय जूता को अपना सरल माद्यम बना लेते है और इसी अंदाज को पूरा करने की कोशिश में यह शर्मसार कार्य को अंजाम दे बैठते है और खुद को फेमस बनाने के चक्कर में जेल की हवा खानी पड़ती है अब तो इन कार्यो से हर प्रेस कांप्रेंस में अब चुनिदा पत्रकार व मीडिया ही जा सकती है क्योकि न जाने पत्रकार के भेष भूसा में कोई भी एक गम्भीर घटना को अंजाम दे सकता है इसलिए आगामी समय में अब मीडिया हाउस को अपने यहा इस तरह के पत्रकारों को रखने से पहले काफी जानकारी व अनुभव का ज्ञान रखना हो गा !
Reply | Forward |

0 comments:
Post a Comment