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मै क्यूँ खुदी से खफा खफा सा लगता हूँ
जिन्दगी आजकल थका थका सा लगता हूँ
कुछ पाने की उम्मीद , हुई है इस कदर
इन दिनों रात में जगा जगा सा लगता हूँ
ओ मेरे सामने वफ़ा की बात नहीं करते
सुना है उनको मै इक आइना सा लगता हूँ
फर्क है सोच का, समझ का, नजरिये का
किसी को पत्थर किसी को खुदा सा लगता हूँ
तेरी आँखों में ओ कशिश दिखाई नहीं देती
निगाह में रहके भी जुदा जुदा सा लगता हूँ
जब से उसने हमें तमगा दिया हरजाई का
खुद की नज़र में मै गिरा गिरा सा लगता हूँ
रात में चुपके से कह गया एक शैतान मुझसे
अब मैं इन्सान से डरा डरा सा लगता हूँ
कल मेरे दादा मेरी दादी से कह रहे थे "अमित "
तुम जब हसती हो तो मै नौजवां सा लगता हूँ




माँ .......माँ .......ओ  माँ ..
खुद  तपी लेकिन  मुझको  दिया  आँचल  का  छाया
माँ .......माँ .......ओ  माँ ..
मेरी  आँखे  नहीं  देखी , तेरी  आँखों  की  ओ  ममता 
मगर  मुझमे  तू  जिन्दा  है , अभी  भी  बन  मेरा  पता 
तेरी  अंगुली  पकड़  करके , भले  ही  न  चला  हु  मै 
तेरे  एहसास  के  दम  पर , हुआ  इतना  बड़ा  हु  मै 
मेरे  रास्ते  का  सुकून  है , तेरी  ममता  की  परछाईयाँ 
माँ .......माँ .......o माँ ..
कभी  रातों  को  छत   पर  मै , जब  तनहा  यु  ही  सोता  हूँ 
तुझे  तारों  में  न  पाकर , बहुत  ज्यादा  ही  रोता  हूँ 
नहीं  जब  चैन  मिलता  तो , तेरी  तस्वीर  देखूं   मै 
तेरे  चेहरे  पर  प्यार  का , एक  कश्मीर  देखूं  मै 
अगर  गिर  जाऊं  जो  कंही  तो  देती  है  हौसला 
माँ .......माँ .......o माँ ..