Saturday, 23 July 2011

अनशन ही अनशन  क्यों ???????
आजकल हर कोई एक ही दर्रे  पर चल रहा है, जिसको देखो व्ही अपना रहा है, हर जगह इसकी ही जबान चल रही है , हर कोई इसको ही अपना लोहा  मान रहा है ,और बस इसकी आड़ ले कर अपने सारे काम  मनवाने की लाख कोशिश कर   रहा है, क्या यह कोई रामबाण  बनगया है ... हां आज के यूग  यानि  कलयूग का बाण और वह है अनशन .यही है जो आजकल खूब  अपना नाम कमा रहा   है,   जहा  भी देखो इनकी ही धूम है आजकल लोग बाबा रामदेव का योग भूल कर इनकी छत्र  छाया में जा बस रहे है ...   जैसा की   पहले से ही भारत देश के लिए यह एक सशक्त माद्यम  रहा है  हमारे राष्ट पिता महात्मा  गाँधी अहिंसा के पाठ  में इस नियम  को सबसे ज्यादा सशक्त   मानते थे... उनका कहना था की कोई जब तुमारे गाल पर एक तमाचा मारे तब तुम अपना दूसरा गाल भी उसके सामने  कर दो उसे स्व; ही ज्ञान हो जायगा  .भारत देश अपनी आजादी की लडाई के लिए इस माद्यम को न जाने कितनी बार आजमा  चूका है और काफी हद तक यह सत्य भी है....  पर आज ना तो अग्रेज  है और ना ही गुलामी  तो फ्हिर क्यों यह आन्दोलन  ..क्या आपने ही लोगो से दबाये जा रहे है या  लोग अपनी  आजादी को पचा नही पा रहे है जो आए  दिन उलटिया  किये जा रहे है .. आज हर कोई अपनी बात कहनेके  लिए अनशन पर बैठ  जा रहा है और प्रशासन बस गाये -बगाहे  बयान बाजी  पर लगा है...  अब  एक समस्या हल नही होती की दूसरी तैयार हो जा रही है क्या सब जिम्मेदारी सरकार की होती है सरकार अच्छा करे तो नाराज- बुरा करे तो नाराज ...आखिरकार में कहना ही पड़ेगा की हम कोई भगवान् नही है जो जादू की छड़ी धुमाया और समस्या हल हो  गयी ...अब अन्ना हजारे जो अपने जीवन के सुरुवाती दौर से ही आन्दोलन के माद्यम से चर्चा मे रहा करते है उन्होंने  जन लोकपाल विधेयक पर काफी बड़ा अनशन रखा और उन्हें यूवाओ की तरफ से काफी समर्थन भी मिला ...सरकार उनकी  बात को नजर  अंदाज नही कर सकी और उनकी जीत हुयी .. अब एयेर इण्डिया के कर्मचारी जो कई बार अनशन पर जा चुके है ....रेलवे कर्मचारी जो बार -बार अपनी मागो को लेकर सरकार को  चेताया करते है ..और अब डाक्टर की पढाई पड़ रहे विद्यार्थी  जो बत्तो को लेकर महारास्ट सरकार के खिलाफ अनशन  पर बैठ गये है ..क्या आन्दोलन करने वालो को य ह नही पता की कितना नुकसान हो रहा है इस आन्दोलन से ...  पर पता हो भी तो क्या हर कोई अपनेलिए लड़ रहा है और उसे एक ससक्त माद्यम चाहिए जो है आन्दोलन ...ना जाने कितनेऔर   लोग है जो किसी ना किसी समस्या से जूझ रहे है लेकिन जीवन को एक संघर्स  मानकर आगे बड़ने की जी तोड़ कोशिश कर रहे है ना जाने  कितनी बार मंदी की आड़ मे  नौकरी से निकाले गये ...कितने लोग मीडिया की राह मे बेबस होकर काम कर रहे है जो दुसरे का माद्यम बनते है वही अपने जीवन के  हालात को जुबा पर नही ला पाते है जिन्हें  समाज का चौथा स्तम्ब कहा जाता है उनकी बात का कोई रूप नही बन पाता है ....क्या सार्वजनिक क्षेत्रो के लोग ही अपने काम के प्रति पूरी इमानदारी दिखाते है क्या सरकारी क्षेत्र के लोग ही अनशन के मार्ग पर जा सकते है ...... समस्या को सुलझाने से हल होती है चिल्लाने से व आन्दोलन से नही  ... आन्दोलन को उही सहज ना समझे..  नही तो सायेद ही  आनेवाले  भविष्य के पास कोई विकल्प मौजूद होगा ........

पंकज दुबे
पत्रकार
मुंबई .

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