Sunday, 14 February 2016
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कैसे होगी लैब की प्रायोगिक परीक्षाएं, जब क्लास रूम में ही सिमट गया प्रयोगशाला
फोटो पेज 1 पर
स्कूल प्रभारी कह रहे : छात्रों का पढ़ाया जाएं या लैब की देखभाल की जाएं
0- हायर व हायर सेकंडरी स्कूल की संख्या 6026
0- बजट के बावजूद प्रायोगिक शाला की दुर्दशा
0- प्रयोगशाला में रसायन व उपकरणों की कमी
0- 15 से 30 जनवरी तक प्रायोगिक परीक्षाएं आयोजित
पंकज दुबे
दबंग दुनिया।
रायपुर।
माशिमं बोर्ड एक तरफ जहां प्रेक्टिकल की परीक्षाओं में बाहर से आ रहे निरीक्षकों का खर्च बचाने के लिए दसवीं-बारहवीं बोर्ड के प्रेक्टिकल परीक्षा कराने की जिम्मेदारी स्कूल प्राचार्यो को सौपने जा रही है, वहीं राजधानी में संचालित सभी हायर सेकंडरी शासकीय व निगम स्कूलों के प्रयोगशालाओं की स्थिति को काफी खस्ताहाल में है। जहां पर एक साथ क्लास के छात्रों का प्रेक्टिकल कराना मुश्किल है, क्योंकि लैंब में पर्याप्त रसायन व उपकरणों की कमी देखी जा रही है।
दबंग दुनिया की टीम ने शहर में चल रहे कुछ प्रमुख शासकीय व निगम हायर सेकंडरी स्कूलों के प्रयोगशालाओं की पड़ताल की। जहां पाया कि अधिकांश स्कूलों के लैंब रूम साल में एक बार सिर्फ बोर्ड प्रेक्टिकल के लिए खोला जाता है उसके बाद हमेशा बंद रहते है। जिससे लैब में पड़े कई रसायन प्रदार्थ व उपकरण का देखभाल नहीं होंने से वह खराब हो गए है। जबकि प्रयोगशाला के नाम पर शिक्षा विभाग हर साल स्कूलों में बजट आवंटित करता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो आगामी सैद्धांतिक व प्रायोगिक परीक्षा के लिहाज से छात्र-छात्राओं को पुन: मुश्किलों का सामना करते हुए परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए पशोपेश की स्थिति बन रही है।
प्रयोगशाला बना स्टोर रूम
कोटा स्थित निगम के हायर सेकंडरी स्कूल में पड़ताल के दौरान देखा गया कि विद्यालयों में विज्ञान गतिविधि ठप है। क्योंकि प्रयोगशाला को क्लास रूम बना दिया गया है। जहां महज एक टेबल रख कर उसी पर लैंब के उपकरण रख दिए है। जो काफी समय से धूल-मिट्टी खा रहे है। साथ ही पाठ्यपुस्कों का अंभार लगा दिया गया है। ऐसे में जब स्कूल प्रभारी हेमंत वर्मा से पूछा गया तो उन्होंने साफ तौर से विभाग की जिम्मेदारी ठहराते हुए कहा कि अब क्या करे, स्कूल में पर्याप्त शिक्षक व लैब अस्सिटेट ही नहीं है। तो छात्रों का पढ़ाया जाएं या लैंब की देखभाल की जाएं। समय आने पर सभी कार्य पूरे हो जाएगे।
धूल-मिट्टी देख शिकायत करोंगे
नगर निगम से महज दूरी पर स्थित माधवराव सप्रे हायर सेकंडरी निगम के स्कूल में जब लैंब रूम को दिखाने की बात स्कूल प्राचार्य उमेश चंद शुक्ला से की गई। उनका साफ तौर पर यही कहना था कि लैंब रूम काफी समय से बंद है। जहां पर अभी काफी धूल-मिट्टी होगी और उसे देखकर आप शिकायत करोंगे। इसलिए किसी दूसरे दिन आइए लैंब की सफाई हो जाएगी तो देख लेना।
उद्देश्यों का हो रहा दरकिनार
स्कूल में बने प्रयोगशालाओं के उद्देश्य को देखा जाएं तो शिक्षकों और छात्र-छात्राओं में विज्ञान के प्रति रूचि बढ़ाना, प्रायोगिक कार्यों की संख्या बढ़ाना, उपकरणों के रखरखाव आदि है। जिले के कई बड़े स्कूलों में प्रयोगशाला को स्टोर बना दिए गए हैं एवं प्रयोगशाला सफाई भी नहीं है। प्राचार्य एवं विषय शिक्षक इस बात को गंभीरता से लेकर प्रयोगशाला व्यवस्थित रखें। प्राचार्य एवं विज्ञान प्रभारी रूचि लेकर छात्र -छात्राओं को प्रायोगिक कार्यों के लिए प्रेरित करें। लेकिन अधिकांश स्कूलों में इस उद्देश्यों की लगातार अवेलना की जा रही है। जिस पर स्कूल शिक्षा विभाग भी मौन बैठा है।
बजट के बावजूद लैब की सफाई नहीं
प्रयोगशाला के नाम पर हर साल स्कूलों में लैब मेंटेन के लिए प्रतिवर्ष 25-25 हजार रुपए प्रत्येक हाईस्कूल, हायर सेकेण्डरी विद्यालय को राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान की ओर से दिया जाता है। इसी तरह निगम में भी लगभग रहता है। जिससे इस बजट से ही स्कूल के शिक्षक प्रयोगशाला के उपकरण, कैमिकल व अन्य सामग्री का क्रय करते हैं। इसके बावजूद राजधानी के चर्चित शासकीय स्कूल प्रो जेएन पाण्डेय हायर सेकंडरी में देखा गया कि बारहवीं के छात्रों से ही लैब रूम की सफाई करवाई जाती है। साथ लैब में पडेÞ कई रासायन अनुउपयोगी हो गए है। ऐसे में शिक्षक सामग्री का क्रय करने में उदासीनता दिखाते हैं।
शिक्षक की कमी से जुझ रहा लैब
प्रयोगशाला के मामले में शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की हालत बहुत खराब है। अधिकांश स्कूलों में लैब के लिए रूम ही नहीं है। कहीं लैब है भी तो वहां शिक्षक पदस्थ नहीं है। नतीजा स्कूलों में बायोलॉजी, रसायन एवं भौतिक शास्त्र के प्रैक्टिकल ही नहीं कराए जाते। जबकि इन विषयों में पारंगत होने के लिए प्रैक्टिकल करना बेहद जरूरी होता है। लेकिन प्रेक्टिकल के अभाव में बच्चों को विषयों का सही ज्ञान नहीं मिल पाता।
लैंब में जरूरी उपकरण
रसायन संबंधी प्रेक्टिकल के लिए लगने वाले सामानों में कोनिकल फ्लास्क , परखनली, रासायनिक चूर्ण, बर्नर। इसी तरह से भौतिक विषय में लगने के लिए स्क्रूगेज, वर्नियर कैलीपर्स, माइक्रोस्कोप, बैटरी। वहीं जिन विद्यालयों में सामाग्री उपलब्ध है, वहां तंग कमरों में प्रयोगशाला संचालित होने के कारण सामानों में जंक लगने लगे हैं।
प्रायोगिक परीक्षा स्थानीय स्तर पर
इससे इस बार बगैर निरीक्षक के लिए स्कूल के प्राचार्य प्रायोगिक परीक्षाएं करा सकेंगे। 15 से 30 जनवरी तक प्रायोगिक परीक्षाएं आयोजित की जाएंगी। अब नवमी, दसवीं की तरह की 11वीं और 12 वीं की सैद्धांतिक और प्रायोगिक परीक्षा स्थानीय स्तर पर करने की तैयारी की जा रही है। वहीं सचिव सुधीर कुमार अग्रवाल का कहना है कि फिलहाल प्रायोगिक परीक्षाएं ही स्कूल के प्राचार्य कर सकेंगे।
वर्जन
लैंब का निरीक्षण जल्द शुरू होगा
विद्यालयों के प्रायोगिक कार्य संचालित करने के लिए प्रति वर्ष 25 हजार रुपए का आबंटन किया जाता है। हाई स्कूल स्तर के प्रायोगिक कार्य ऐसे है जिसे कक्षा में ही किया जा सकता है। प्राचार्यों की जिम्मेदारी है कि विद्यालयों में बने सभी प्रायोगिक कार्यों का अवलोकन करें। साथ ही आगमी परीक्षा के तहत प्रायोगिक एवं सैद्यांतिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्कूलों का सतत निरीक्षण शुरू किया जाएगा।
आशुतोष चावरे
जिला शिक्षा अधिकारी
रायपुर
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