लाचारी ....पर हो एक सोच ?
मुंबई ;हिंदी भाषा मे ना जाने कितने शब्द है जिसका मतलब इंसान के जीवन पर बड़ा ही भारी प्रभाव डालता है जैसे बेचारा ,,कमजोर ,बेबस ,दयनीय ,दुर्बल ,कर्महीन और लाचार...आदि इन हिंदी के भाषा को सायद कोई अपने पूर्व जीवन का कोई पुराना हिसाब चुकाना रह गया है जो इस नाम से बेचारे नवाजे गये है या कहें लादे गये है .जिस प्रकार से घर के बड़े लोग कहते की सुबह -सुबह अगर भगवान् का नाम लिया जाय तो हर काम सुफल व सरल बन जाता है उसी तरह से ये हिंदी भाषा के चंद शब्द भी अपना पूर्व का कर्ज सायद चूका रहे है
अब इन भाषा के बारे मे सोचा जाय तो सायद हर कोई उपरोक्त्त की चन्द लाइनों को सही ठहराएगा.. कही ऐ किसी का फायदा पहुचाते है तो कही किसी का वजूद ही मिटाते है अब एक बार किसी मित्र ने अपने एक महिला मित्र को नौकरी दिलाने के लिए इन भाषो का बड़े ही जोरशोर तरीके से प्रयोग किया की सर बड़ी इमानदार है मेहनती है परिश्रमी है लेकिन बेचारी आज जॉब के लिए दर -बदर ठोकर खा रही है ...अब मित्र जनाब अपना काम तो कर दिए अपने दोस्त को नौकरी के लिए सिफारिश लगा दिए .....मित्र सोचे थोडा इन शब्दों का परयोग करने से क्या फर्क पड़ता है ..नौकरी तो पक्की है .रही बात बॉस की तो हर व्यवसायी अपने दिन रात के मेहनत से बनाये व्यपार पर पैनी नजर टिकाये रहता है लेकिन अब अकेले पूरा व्यवसाय तो नही चलेगा कामकरने वालो की जरुरत तो पड़ेगी यहा पर भी बेचारी का प्रभाव है लेकिन एक कहावत है समर्थ के नही दोष गोसाई तो उसी प्रकार से निर्बल मे है दोष गोसाई "
बस कामगार को नौकरी तो मिली लेकिन कई भाषण सुनने के बाद जैसे ..आप को बड़ी ईमानदारी से काम करना पड़ेगा ,समय को ध्यान मे रखना पड़ेगा आप अभी काफी नये है काम को जल्दी शिखने का प्रयास करियेगा ,पगार जय्दा नही मिलेगा हमे जानकार कामगार की जरुरत है लेकिन फला ने आप के बारे मे बताया की आप परेशान है लाचार है इसलिए आप को मौका देते है ..अब बेचारा कामगार की तो बोलती बंद हो गयी की यह तो पहले दिन की सुरवात है पूरा महिना अभी बाकि है पर लाचार ?? अब शुरु हो गये इन सभी भाइयो का अपना- अपना किरदार ..कुछ महीने दिल को समझाए ..कुछ महीने दोस्तों ने कहा क्या कर सकते हो कमजोर है .कुछ महीने बाद ऑफिस के कैत्तिन में गुप्त- गू क्या कर सकते है बेबस है यार ,फिर दिमाकी दबाव कम समय में जय्दा काम ,फिर आया दयनीय आगे चल कर सेहत पर बुरा असर तो लोग कहेगे बड़ा ही दुर्बल होगया ,,,और अंत में काम छुट गया तो दोस्त कहेगे कर्महीन है काम नही करना चाहता है यकीन कोई नही करेगा जब तक उपरोक्त चंद भाषा के साये से दूर हटा नही जाता है ....और बॉस की जबान बोलेगा की मै तो तुमारे कहने से रख लिया तुम बोले बेचारा बड़ा परेशान है
अब हर कोई अपने काम करवाने के लिए इन भाषो का उपयोग कर लेता है कही झूठ तो कही सिफारिश लेकिन पिसता है एक भावना जो सही रूप से इसका कही जिम्मेदार नही होता है अगर इनका प्रयोग अर्थात सिपारिश न लगाया जाय तो फला व्यक्ति की छवि को कार्यो के तहत देखा जाएगा और विकास की बात बनती नजर आएगी हर कोई अपने को मेहनती मानेगा और बिना किसी सिफारिश के जीवन की नयी दिशा का निर्माण करेगा
लेकिन .इन महानुभाव की बड़ी जगह में उपयोग किया जाता है जैसे मिनिस्टर के दफ्तर में कर्चारी फाइल को आगे बढाने में, डाक्टर से विनती करते मरीज के परिजन ,पुलिस से सिफारिश करते चंद बदमाश लोग. वकील से जिरह करते मुक्किल के परिजन, फुटपाथ पर डेला लगाते लोग ,,ऑफिस के कैटिन में पगार व छुट्टी की दरखास लगाये कामगार लोग ,अर्थात हर जगह इनका सिक्का चलता है सायद आगामी समय में इनकी विरासत काफी बढ जाय और लोग नाम , जात, पता ,पूछने के बजाय इन भाषो से पहचाने .क्या इन विषयों पर कभी कोई सोचा है या सोचेगा अब तो आने वाला समय ही बताएगा की कितना जरुरी है लाचारी पर एक हो सोच ??
पंकज दुबे
09769365220
