Friday, 29 July 2011
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अभियक्ति की आजादी जूता भी नही ??
भारत मे आजादी का बड़ा महत्तव है कियोकी इस आजादी के लिए ना जाने कितने महान पुरशो ने अपने जान को न्योछावर कर दिया है , तब जाकर आज हम आजादी के रूप मे मना रहे है लेकिन इस आजादी के आड़ मे व्यक्ति की अभियक्ति जूता बन जाय जिसे वहा जब चाहे वह पैर मे पहनने के बजाय हाथ मे लेकर सभा मंच पर बैठे महानुभाव की तरफ उछाल दे ,अब यह एक जनसमुदाय के लिए बड़ा ही सोचनीय विषय बन गया है !
भारत देश ने अपनी आजादी की लडाई की शुरवात के समय भी इस तरह के अभियक्ति का कभी भी उपयोग नही किया गया, जबकि उस दौर मे शिर्फ़ धरना प्रदर्शन ,काली पट्टी , भूख हड़ताल ,यानी की अहिंसा का सदा ही मार्ग अपनाया गया था! आज समय के बदलाव के साथ इस दौर में काफी बदलाव देखा जा रहा है हर जगह विरोध का तरीका बदलने जैसा हो गया है !राजनितिक पार्टिया से लेकर विभिन्न सरकारी संगठन के लोग भी अहिंसा के बदले हिंसा का मार्ग सुलभ समझ रहे है ! न जाने कितने उदाहरण देखन व सुनने को मिल जाते है की उस आदोलन में इतने लोग घायल हुए है, और कुछ एक लोग की भागदौड़ में कुचलने से मृत्रू हो गयी है !सार्वजिनक स्थल से लेकर सरकारी विभागों के कार्यो में जोर शोरे से हिंसा की प्रतिक्रिया का रूप सामने देखने को मिलता है !
भारतीय समाज का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन हुआ है ! अब कलम की ताकत को कुछ लोग फीका समझ कर अपने अभियक्ति का प्रदर्शन जूता के माद्यम से करने लगे है !अभी कुछ समय पहले की बात है की नई दिल्ही में कांगेश कार्यालय में मेदोइय प्रभारी के प्रमुख जनार्दन दिवेदी सावंदाताओ को संबोधित कर रहे थे की तभी एक पत्रकार महानुभाव ने अपने सवाल के जवाब से असंतुस्थ होकर जूता निकालकर मंच पर पहुच गये हलाकि सुरक्षा विभाग ने मौके की नजाकत को भापते हुए तुरंत पत्रकार महोदय को सभा से बाहर कर दिया ! इसी तरह ७ अप्रैल २००९ को पत्रकार जनरैल सिंह ने भी पी चिदम्बरण
के प्रेष सभा में उनके उपर उछाला था .बहरहाल यह जूता उछालने की शुरवात भारत में ही नही विदेशो में भी देखा गया है ! अमेरिका के राष्टपति जौज बुश पर भी फेका गया था ! अब इन पत्रकारों को पकडे जाने पर इनके पीछे लगे मीडिया कंपनी अपना हाथ पीछे खीच लेती है और कहती है की वह हमारा साव्व्दाता है ही नही जिससे यह पूरा पकरण कुछ दिन बाद मामूली बन जाता है और समाप्त हो जाता है !
समाज का चौथा स्तंभ कहा जाने वाली पत्रकरिता को कहे या इसकी आड़ में पत्रकार महोदय को संबोधित किया जाय,क्या यह शोभा देती है की समाज में लोगो को जागरूक करने के बजाय इस तरह के असभ्य व निदनीय कार्यो को अपने अभिव्यक्ति का माद्यम बनाकर पत्रकारिता क्षेत्र के महानुभाव को शर्मसार कर दिया जाय ! मीडिया हमेशा एक माद्यम बनने का कार्य करती है न की उस कार्य का सम्पूर्ण रूप बनती है !पत्रकारिता समाज को सच्चाई परोसने का काम करती है न की उस पर अपना फैसला सुनाती है !
पत्रकारिता क्षेत्र में कुछ नये यूवा पत्रकार शायेद कुछ जय्दा उत्तेजिक व भावुक हो जाते है जो पत्रकारिता के सही माप दंड को भुला बैठेते है और कलम की ताकत को अभिव्यक्ति बनने के बजाय जूता को अपना सरल माद्यम बना लेते है और इसी अंदाज को पूरा करने की कोशिश में यह शर्मसार कार्य को अंजाम दे बैठते है और खुद को फेमस बनाने के चक्कर में जेल की हवा खानी पड़ती है अब तो इन कार्यो से हर प्रेस कांप्रेंस में अब चुनिदा पत्रकार व मीडिया ही जा सकती है क्योकि न जाने पत्रकार के भेष भूसा में कोई भी एक गम्भीर घटना को अंजाम दे सकता है इसलिए आगामी समय में अब मीडिया हाउस को अपने यहा इस तरह के पत्रकारों को रखने से पहले काफी जानकारी व अनुभव का ज्ञान रखना हो गा !
पंकज दुबे( पत्रकार )
भारत मे आजादी का बड़ा महत्तव है कियोकी इस आजादी के लिए ना जाने कितने महान पुरशो ने अपने जान को न्योछावर कर दिया है , तब जाकर आज हम आजादी के रूप मे मना रहे है लेकिन इस आजादी के आड़ मे व्यक्ति की अभियक्ति जूता बन जाय जिसे वहा जब चाहे वह पैर मे पहनने के बजाय हाथ मे लेकर सभा मंच पर बैठे महानुभाव की तरफ उछाल दे ,अब यह एक जनसमुदाय के लिए बड़ा ही सोचनीय विषय बन गया है !
भारत देश ने अपनी आजादी की लडाई की शुरवात के समय भी इस तरह के अभियक्ति का कभी भी उपयोग नही किया गया, जबकि उस दौर मे शिर्फ़ धरना प्रदर्शन ,काली पट्टी , भूख हड़ताल ,यानी की अहिंसा का सदा ही मार्ग अपनाया गया था! आज समय के बदलाव के साथ इस दौर में काफी बदलाव देखा जा रहा है हर जगह विरोध का तरीका बदलने जैसा हो गया है !राजनितिक पार्टिया से लेकर विभिन्न सरकारी संगठन के लोग भी अहिंसा के बदले हिंसा का मार्ग सुलभ समझ रहे है ! न जाने कितने उदाहरण देखन व सुनने को मिल जाते है की उस आदोलन में इतने लोग घायल हुए है, और कुछ एक लोग की भागदौड़ में कुचलने से मृत्रू हो गयी है !सार्वजिनक स्थल से लेकर सरकारी विभागों के कार्यो में जोर शोरे से हिंसा की प्रतिक्रिया का रूप सामने देखने को मिलता है !
भारतीय समाज का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन हुआ है ! अब कलम की ताकत को कुछ लोग फीका समझ कर अपने अभियक्ति का प्रदर्शन जूता के माद्यम से करने लगे है !अभी कुछ समय पहले की बात है की नई दिल्ही में कांगेश कार्यालय में मेदोइय प्रभारी के प्रमुख जनार्दन दिवेदी सावंदाताओ को संबोधित कर रहे थे की तभी एक पत्रकार महानुभाव ने अपने सवाल के जवाब से असंतुस्थ होकर जूता निकालकर मंच पर पहुच गये हलाकि सुरक्षा विभाग ने मौके की नजाकत को भापते हुए तुरंत पत्रकार महोदय को सभा से बाहर कर दिया ! इसी तरह ७ अप्रैल २००९ को पत्रकार जनरैल सिंह ने भी पी चिदम्बरण
के प्रेष सभा में उनके उपर उछाला था .बहरहाल यह जूता उछालने की शुरवात भारत में ही नही विदेशो में भी देखा गया है ! अमेरिका के राष्टपति जौज बुश पर भी फेका गया था ! अब इन पत्रकारों को पकडे जाने पर इनके पीछे लगे मीडिया कंपनी अपना हाथ पीछे खीच लेती है और कहती है की वह हमारा साव्व्दाता है ही नही जिससे यह पूरा पकरण कुछ दिन बाद मामूली बन जाता है और समाप्त हो जाता है !
समाज का चौथा स्तंभ कहा जाने वाली पत्रकरिता को कहे या इसकी आड़ में पत्रकार महोदय को संबोधित किया जाय,क्या यह शोभा देती है की समाज में लोगो को जागरूक करने के बजाय इस तरह के असभ्य व निदनीय कार्यो को अपने अभिव्यक्ति का माद्यम बनाकर पत्रकारिता क्षेत्र के महानुभाव को शर्मसार कर दिया जाय ! मीडिया हमेशा एक माद्यम बनने का कार्य करती है न की उस कार्य का सम्पूर्ण रूप बनती है !पत्रकारिता समाज को सच्चाई परोसने का काम करती है न की उस पर अपना फैसला सुनाती है !
पत्रकारिता क्षेत्र में कुछ नये यूवा पत्रकार शायेद कुछ जय्दा उत्तेजिक व भावुक हो जाते है जो पत्रकारिता के सही माप दंड को भुला बैठेते है और कलम की ताकत को अभिव्यक्ति बनने के बजाय जूता को अपना सरल माद्यम बना लेते है और इसी अंदाज को पूरा करने की कोशिश में यह शर्मसार कार्य को अंजाम दे बैठते है और खुद को फेमस बनाने के चक्कर में जेल की हवा खानी पड़ती है अब तो इन कार्यो से हर प्रेस कांप्रेंस में अब चुनिदा पत्रकार व मीडिया ही जा सकती है क्योकि न जाने पत्रकार के भेष भूसा में कोई भी एक गम्भीर घटना को अंजाम दे सकता है इसलिए आगामी समय में अब मीडिया हाउस को अपने यहा इस तरह के पत्रकारों को रखने से पहले काफी जानकारी व अनुभव का ज्ञान रखना हो गा !
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लाचारी ....पर हो एक सोच ?
लाचारी ....पर हो एक सोच ?
मुंबई ;हिंदी भाषा मे ना जाने कितने शब्द है जिसका मतलब इंसान के जीवन पर बड़ा ही भारी प्रभाव डालता है जैसे बेचारा ,,कमजोर ,बेबस ,दयनीय ,दुर्बल ,कर्महीन और लाचार...आदि इन हिंदी के भाषा को सायद कोई अपने पूर्व जीवन का कोई पुराना हिसाब चुकाना रह गया है जो इस नाम से बेचारे नवाजे गये है या कहें लादे गये है .जिस प्रकार से घर के बड़े लोग कहते की सुबह -सुबह अगर भगवान् का नाम लिया जाय तो हर काम सुफल व सरल बन जाता है उसी तरह से ये हिंदी भाषा के चंद शब्द भी अपना पूर्व का कर्ज सायद चूका रहे है
अब इन भाषा के बारे मे सोचा जाय तो सायद हर कोई उपरोक्त्त की चन्द लाइनों को सही ठहराएगा.. कही ऐ किसी का फायदा पहुचाते है तो कही किसी का वजूद ही मिटाते है अब एक बार किसी मित्र ने अपने एक महिला मित्र को नौकरी दिलाने के लिए इन भाषो का बड़े ही जोरशोर तरीके से प्रयोग किया की सर बड़ी इमानदार है मेहनती है परिश्रमी है लेकिन बेचारी आज जॉब के लिए दर -बदर ठोकर खा रही है ...अब मित्र जनाब अपना काम तो कर दिए अपने दोस्त को नौकरी के लिए सिफारिश लगा दिए .....मित्र सोचे थोडा इन शब्दों का परयोग करने से क्या फर्क पड़ता है ..नौकरी तो पक्की है .रही बात बॉस की तो हर व्यवसायी अपने दिन रात के मेहनत से बनाये व्यपार पर पैनी नजर टिकाये रहता है लेकिन अब अकेले पूरा व्यवसाय तो नही चलेगा कामकरने वालो की जरुरत तो पड़ेगी यहा पर भी बेचारी का प्रभाव है लेकिन एक कहावत है समर्थ के नही दोष गोसाई तो उसी प्रकार से निर्बल मे है दोष गोसाई "
बस कामगार को नौकरी तो मिली लेकिन कई भाषण सुनने के बाद जैसे ..आप को बड़ी ईमानदारी से काम करना पड़ेगा ,समय को ध्यान मे रखना पड़ेगा आप अभी काफी नये है काम को जल्दी शिखने का प्रयास करियेगा ,पगार जय्दा नही मिलेगा हमे जानकार कामगार की जरुरत है लेकिन फला ने आप के बारे मे बताया की आप परेशान है लाचार है इसलिए आप को मौका देते है ..अब बेचारा कामगार की तो बोलती बंद हो गयी की यह तो पहले दिन की सुरवात है पूरा महिना अभी बाकि है पर लाचार ?? अब शुरु हो गये इन सभी भाइयो का अपना- अपना किरदार ..कुछ महीने दिल को समझाए ..कुछ महीने दोस्तों ने कहा क्या कर सकते हो कमजोर है .कुछ महीने बाद ऑफिस के कैत्तिन में गुप्त- गू क्या कर सकते है बेबस है यार ,फिर दिमाकी दबाव कम समय में जय्दा काम ,फिर आया दयनीय आगे चल कर सेहत पर बुरा असर तो लोग कहेगे बड़ा ही दुर्बल होगया ,,,और अंत में काम छुट गया तो दोस्त कहेगे कर्महीन है काम नही करना चाहता है यकीन कोई नही करेगा जब तक उपरोक्त चंद भाषा के साये से दूर हटा नही जाता है ....और बॉस की जबान बोलेगा की मै तो तुमारे कहने से रख लिया तुम बोले बेचारा बड़ा परेशान है
अब हर कोई अपने काम करवाने के लिए इन भाषो का उपयोग कर लेता है कही झूठ तो कही सिफारिश लेकिन पिसता है एक भावना जो सही रूप से इसका कही जिम्मेदार नही होता है अगर इनका प्रयोग अर्थात सिपारिश न लगाया जाय तो फला व्यक्ति की छवि को कार्यो के तहत देखा जाएगा और विकास की बात बनती नजर आएगी हर कोई अपने को मेहनती मानेगा और बिना किसी सिफारिश के जीवन की नयी दिशा का निर्माण करेगा
लेकिन .इन महानुभाव की बड़ी जगह में उपयोग किया जाता है जैसे मिनिस्टर के दफ्तर में कर्चारी फाइल को आगे बढाने में, डाक्टर से विनती करते मरीज के परिजन ,पुलिस से सिफारिश करते चंद बदमाश लोग. वकील से जिरह करते मुक्किल के परिजन, फुटपाथ पर डेला लगाते लोग ,,ऑफिस के कैटिन में पगार व छुट्टी की दरखास लगाये कामगार लोग ,अर्थात हर जगह इनका सिक्का चलता है सायद आगामी समय में इनकी विरासत काफी बढ जाय और लोग नाम , जात, पता ,पूछने के बजाय इन भाषो से पहचाने .क्या इन विषयों पर कभी कोई सोचा है या सोचेगा अब तो आने वाला समय ही बताएगा की कितना जरुरी है लाचारी पर एक हो सोच ??
पंकज दुबे
09769365220
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राहुल का मुंबई सफ़र
राहुल का मुंबई सफ़र (५/०२/२०१० )
मुंबई में भाषावाद को उठाकर शिवसेना व मनसे ने जहा हिंदी भाषा पर अपना प्रहार करके अपनी राजनीती को चमकाने की कोसिस कर रही थी तो व्ही इन तमाम राजनितिक पार्टियों के मनसा पर ताला लगाया कांगेश के यूराज व महासचिव राहुल गाँधी ने जीनोने अपने राज्य यात्रा के दैरान कहा की मुंबई सबकी है ...२६/११ के आतंकी हमले में बिहार और उत्तरप्रदेश के लोग भी सहीद हुए है ,..मुंबई सभी की है न की म्हारास्त वालो की है ...... राहुल गाँधी के इस भयान से शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने कहा की राहुल गाँधी ने यह बोलकर मुंबई के २६/११ के हमले में सहीद बहादुर शिपहियो के सहादद को दुःख पहुचाया है और इसके लिए उन्हें माफ़ी मगनी चाहिए ......और सामना के समाचार पत्र में शिवसेना के सभी शिव्सनिक को निर्देश दिए की वह राहुल गाँधी के मुंबई आने पर काले झंडे दिखाकर अपना विरोध करेगी ....इस ब्यान को मुबई में एक जंग की तरह देखा जाने लगा ... जैसा की शिवसेना पार्टीय की बात की जाय तो वः मुंबई में ४० साल से अपने राजनीत को चला रहे है और अपने पार्टीय के प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के आदेश को नही मानेगे यह हो नही सकता है ..इस बात को मुंबई वासियों के साथ राजनितिक की सभी पार्टीय अच्छी तरह जानते है ..अब मुंबई में कांगेश की सरकार है और उनके ही पार्टी के यूराज व महासचिव की शुरक्षा में किसी प्रकार की कमी रहे यह बरदास नही होगा ...जिससे मुंबई के तमाम प्रमुख जगहों पर सुरक्षा के पुक्ते इन्तेजाम किये गये ...राहुल गाँधी का जिन रास्तो से काफिला को निकलना था उस जगह पर मुंबई पुलिस के जवान लगा दिए गये थे जिससे राहुल गाँधी की शुरक्षा में कमी न हो और शिवसेना के शिव्सनिको की चाल को नाकाम कर राहुल की सुक्र्क्षा को बड़ा दिया था
राहुल गाँधी मुंबई के ऐयेर पोर्ट पर ११ बजे पहुचे और उनकी आगुवाई किये महारास्त के मुक्यमंत्री अशोक चव्हान ने .....उसके बाद शुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राहुल को हेलिकैप्तेर से जुहू में लैंड कराया गया .जिसके बाद शुरू हुआ राहुल का सामना ...शिवसेना के शिव्सनिको के साथ सामना
मुंबई में राहुल गाँधी की शुरक्षा को देखते हुए मुंबई के तमाम इलाको में १४०व १५१ ध्रारा लगायी गयी है जिसके तहत ५लोगो का झुण्ड नही धिखना नही चाहिए राहुल गाँधी के विरोध में काफी संख्या में शिवसेना के पार्सद व कई कार्यकर्ता को गिरफ्त्तार किया गया जो राहुल के पुतले फुके व काले झंडे दिखाने की कोशिस कर रहे थे ...ड़ी न नगर में शिव्सनिको पर लाठी चार्ज किया गया ...कुल मिलाकर १००-१५० शिव्सैनको को पकड़ा गया ......राहुल भाईदास हाल में आये और यहा पर १७ कॉलेज के११००शो
छात्र -छात्राओ को संबोधित किया उनके सवालों का जवाब भी दिया--साथ ही साथ इस युवा ग्रुप को पोलिटिकल में आगे आने के लिए कहा ...राजनितिक में यह जरुरी नही की फैमली का होना ...जैसा की राहुल गाँधी ने अपने इस यात्रा को यूथ ओर्गेनैजेसन की मुहीम बताई है ......राहुल गाँधी का प्रभाव यूवा लोगो पर साफ़ देखा गया
इसके बाद राहुल गाँधी का अगला मुकाम था घाटकोपर का रमाबाई कालोनी का इलाका ...जहा पर मुंबई कांगेर्ष के कई बड़े नेता व मुख्यमत्री इन्तजार कर रहे थे ...जैसे ही राहुल गाँधी का काफिला पवन हंस के चैफेर हेलीकाप्टर की तरफ बड़े की राहुल गाँधी ने एकाएक अपने काफिला को अँधेरी रेलवे स्टेशन की तरफ मुड़ने को कहा और पहुच गये अंधरी स्टेशन जहा पर अपने s.p z शुरक्षा को लेकर अंधरी स्टेशन के प्लेत्फोम नोम्बर ५ से दादर के लिए रवाना हुए फर्स्ट दर्जे में ... दादर जाते वक्त राहुल गाँधी ने आम लोगो से मुलाकात भी किया और उनके विचार को सुने इसके बाद दादर स्टेशन पर उतरकर अब घाटकोपर जाना था इसके लिए राहुल गाँधी ने व्ही के एक बैंक ऑफ इंडिया में जाकर ऐतिम से पैसे निकाले..उसके बाद जाकर आम लोगो की तरह लाइन में खड़े होकर घाटकोपर का टिकट निकाला और डिब्बे के दुसरे दर्जे में जाकर घाटकोपर तक की यात्रा की ....घाटकोपर स्टेशन पर पहुचने के बाद राहुल सीधा रमाबाई कालोनी गये जहा पर उन्होंने भीमराव अम्बेडकर के प्रतिमा पर फूल चड़ाए उस वक्त महारास्त के गृहराज्य मंत्री रमेश बागवे ने राहुल गाँधी करे जूते उठाये गाँधी उसके बाद रमाबाई कालोनी के च्वालमें जाकर वहा के रहिवासियो से मुलाकात किया और उनके बातो को सुना इसके बाद राहुल गांघी वहा से शीधे मुंबई के डोमेस्टिक एअरपोर्ट पर गये जहा से उनका अगला पड़ाव पदुचेरी में है ....
अब rahul. गाँधी के इस सफ़र में जहा उन्होंने यूवा को राजनितिक में आगे आने को कहा तथा राजनितिक में बदलाव लाना चाहते है व्ही दूसरी तरफ कहा की मुंबई पुरे भारत की है जहा पर हर लोगो को रहने का अधिकार है .व्ही शिवसेना को अपने अंदाज में जवाब भी दिया तथा दादर में उतरकर..शिवसेना को करारा जवाब भी दिया जैसा की शिवसेना का मुख्या ऑफिस दादर में है और मुंबई की लाइफ लाइन कहीजानेवाली मुंबई ट्रेन से यात्रा करके बता दिया की अगर सरकार चाह ले तो कोई भी आम जनता व राज्य को नुक्सान नही पंहुचा सकता है लिकिन अगर राहुल गांघी की बात न की जाय तो क्या मुंबई में पिछले कई दिनों से परप्रान्तियो पर भाषा के नाम पर उनपर जो अत्याचार किये जा रहे है क्या उनकी शुरक्षा की जिम्मेदारी वहा की सरकार की नही होती है फ्हिलहाल राहुल गाँधी के इस बयान से की मुंबई सभी भारतीयों की है इससे सायद मुंबई में भाषा वाद पर उठे बवाल को रोका जा सके अब तो यह आने वाला समय ही बताएगा की यहा की सरकार कितनी बात मानती है अपने यूराज राहुल गाँधी की .................write बाय पंकज दुबे रिपोटर (a2z न्यूज़ चैनल मुंबई )९७६९३६५२२०/९३२००१४६१९/.......
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माय नेम इज खान , तो माय नेम इज ठाकरे !
माय नेम इज खान ,
तो माय नेम इज ठाकरे !
भारत देश जो कभी सोने की चिड़िया का देश कहा जाता था .जहा पर कई धर्म के लोग आपस मे मिलजुल कर रहते थे ..हर जाति के लोग एक दुसरे को अपना भाई मानता था और एक दुसरे के लिए जान देने के लिए तैयार रहता था ..........लेकिन आज के भारतीय को अब पहले अपने धर्म और जाति को बताना व बचाना होगा .....
कियोकी शाएद आज के राजनितिक लोगो को यह लग रहा है की भारत देश से बढकर यह बात है ... भारत देश की अन्य दूसरी समस्याओं से ज्यादा यह बात बड़ी लगने लगी है ...आज के राजनितिक अब अपने -अपने राज्यों मे इन्ही सब मुद्दों को भुनाने मे लग गये है और अपने पार्टी को बेहतर व सफल बनाने के लिए सायद इन मुद्दों को कैरमबोर्ड के खेल की तरह खेलना चाह रहे है .
मुंबई जिसे फिल्मो की दुनिया कहा जाता है जो देशऔर दुनिया को मनोरंजन करता है जहा कहा जाता है की मुंबई मे " पैसा उड़ता...है बस पकड़ने वाला चाहिए" अब यह तकमा पुराना हो गया है ..मुंबई अब शायद विवादों का शहर बन गया है जहा हर नये दिन विकास के बातो को भुला कर रोज नये मुद्दों को सीचा जा रहा है .....
अगर देखा जाय तो ...मास्टर बलास्टर सचिन तेंदुलकर ने एक प्रेस कांफ्रेंस मे कहा की मै पहले एक भारतीय हूँ तब जाकर महारास्तीय हूँ और मै देश के लिए खेलता हूँ ..
पूरी दुनिया मे भारत का नाम करने वाले मास्टर बलास्टर सचिन तेंदुलकर को भी कहा गया की राजनीत से दूर रहे तो .अच्छा रहेगा ....
मुकेश अम्बानी जिनके व्यपार से भारत देश को आर्थिक व काफी लोगो को रोजगार मिला है ,,,इंग्लैण्ड मे उन्होंने कहा की मुंबई सबकी है और सबका अधिकार है ...
तो उनको भी बता दिया गया की आप अपने काम पर ध्यान रखिये आपका जितना अधिकार आपके कम्पनी पर है उतना ही हर महारास्ती भूमिपुत्र का है
अब राहुल गाँधी ने अपने राज्य दौरे के समय कहा की मुंबई मे सबका अधिकार है बिहार ,,उ,प के लोग भी २६/११ के हमले मे शहीद हुए है ....
अब राहुल गाँधी ठहरे दिल्ली वाले फ्हिर भी मुंबई आने पर राहुल गाँधी को काले झंडे दिखाये जाए भगवा ने घोसना कर दिया अब अपने पार्टीय प्रमुख की बात को मस्तक की लकीर बना लिया और शुरू होगया बयानों को सिलसिला ....राहुल गाँधी मुंबई आये और कांगेश अपने राजकुमार की इज्जत तो बचा लिया लेकिन राहुल गाँधी भगवा के घर मे मिर्ची का धुँआ छोड़ गये .....
आस्टेलिया मे भारतीयों पर हमले हो रहे है हमारे छात्रो को मारा जा रहा है जिससे हम मुंबई मे उन्हें खेलने नही देगे ......अब शारुख खान के बयान की ipl me paak khiladiyo ko लेना चाहिए .भगवा को मिली जान और सवार हो गये ...लगे करने शेर की दहाड़ .........
अब शरुख कोई टैक्सी ,खोमचेवाले तो है नही जिन्हें हिंसक तरीके से समझाया जाय.... भगवा ने कहा की शारुख ...माफ़ी मागे नही तो पाक चले जाये...और माय नेम इज खान फिल्म को मुंबई मे प्रद्र्सिथ नही होने दिया जायगा .... शारुख ने कहा की मैंने गलत नही कहा तो माफ़ी किस बात की मै भारतीय हूँ मुझे म्हारास्ट से प्यार है आज मै जो भी हूँ महारास्ट की वजह से हूँ जहा -तहा शिवसेना मान तो गयी लेकिन क्रिसी मंत्री शरद पवार महगाई कम तो नही किया और पहुच गये मातोश्री .मे बाला बालासाहेब ठाकरे जी से मिलने आब बात बनते-बनते विगड गयी और फ्हिर भगवा की दहाड़-सुनाई पड़ी की हम फिल्म को रिलीज नही होने देगे जबतक की शारुख माफ़ी नही मागते है अब सबकी नजर पड़ गयी इन राजनितिक बयानों पर व्ही राज्य की सरकार शरद पवार से नाराज तो हुयी ...लकिन जगजाहिर नही कर पायी..और सरकार मे सामिल सभी पदों के मंर्ती लोगो को सुक्र्क्षा का भरोसा दे ने लगे ..और मुंबई के सभी थियेटर पर पोलिस का कड़ा पहरा लगा दिया गया और शिवसेना नाम के परिंदे पर ना मार पाए इसकी शक्त हिदायत दी गयी ... मुंबई पूरी छावनी मे बदल गयी ...और कई जगहों के विरोध के बाद माय नेम इज खान को रिलीज किया गया ..आखिर खान की तो जीत हो गयी लेकिन इन तमाम राजनितिक नेताओ को सायद इस बात का एहसास नही हुया की... हमारे इस बयान बाजी से भारत देश का कितना मान सम्मान बढेगा दुसरे देशो मे ....काश देश को चलाने वाले राजनेता को इस बात का एसास होता .....तो शायद यह नही कहा जाता की माय नेम इज ...............
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सुनामी; सुनी कर जाती है जिन्दगी
सुनामी; सुनी कर जाती है जिन्दगी
सुनामी जो अपने नाम से ही बड़ा जाना पहचाना सा लगता है जिसके आने के बाद पूरा बुचाल ही नही मच जाता है बल्कि प्रकितिक का तहस- नहस तक हो जाता है यह तीन अक्षरों का नाम ना जाने कितनी बार तबाही मचाया है, जैसा की सुनामी जापान भाषा का शब्द है ,जो दो शब्दों त्सु (tsu) और नामी(nami ) से मिलकर बना है ऐसे इसे भैगोलिक रूप मे ज्वारीय धराये (tidal waves ) भी कहा जाता है,सुनामी आने की कुछ खास वजह तब मानी जाती है जब समुद्री क्षेत्र मे पृथ्वी की सतह के निचे पड़ी हुयी तक्तोनिक पलेट्स मे जोरदार हलचल होने लगती है और इस हलचल से वहा के जगहों मे बदलाव होने लगता है जिससे आपसी टकराव पैदा होने लगती है और इस टकराव से एक जोर की तीब्र उर्जा पैदा होती है जो समुद्री भूकंप का एक ब्यापक रूप धारण ग्रहण कर लेती है जिसके बाद समुद्री क्ष्तेरो मे उची- उची लहरे उठनी लगती है और जो सुनामी बनकर लाखो करोडो जान -माल पर कहर डाल देती है
तथा इसके आलावा ज्वालामुखी विस्फोट और भूस्खलन भी सुनामी की कुछ हद तक वजह मानी जाती है अब ये लहरे किसी महादिव्प के किनारे छोर पर उठे तो पानी अपने मूल अस्तर से दूर तक फ़ैल जाता है और काफी नुकसान पहुचाने लगता है
११मार्च ,२०११ को जापान के उत्तरी -पूर्वी इलाको मे भूकंप के बाद जापान मे जबरदस्त सुनामी ने अपना कहर गिराया जिसे सायद है कोई भूल पायगा. इससे पहले जापान मे सन १९०० मे भूकंप आया था जो विश्व का पाचवा बड़ा भूकंप मना गया था जिसकी तीब्रता रिक्टर पैमाने पर ८.९ मापी गयी थी सुनामी आने मे सबसे बड़ा रोल भूकंप का रहता है सिस्मोमीटर के माद्यम से भूकंप की तीब्रता को मापा जाता है जिसे सिस्मोग्राफी कहते है, 3 से कम रिक्टर की तीब्रता के भूकंप को सामान्य तौर पर माना जाता है जबकि ७ रिक्टर की ज्यादा तीब्रता को घम्भीर भूकंप माना जाता है और सुनामी की लहरों की रफ़्तार ४०० की. मी प्रति घंटे तक हो सकती है और समुद्र की लहरों की उचाई ३० फीट से भी जय्दा उठ सकती है ,अब कारन चाये भूकंप हो या सुनामी पर जब इनका कहर मानवो जीवन पर पड़ता है तो ना जाने कितने जान- माल का कोहराम देखने को मिलता है और लाख वैज्ञानिक उप्लाभ्धिया के बावजूद हमें बस संतोष है करना पड़ता है और फ्हिर व्ही पूरानी कहावतो पर सोचना पड़ता है की "आधी आवो तो बैठ गवाए " लेकिन जिन्दगी तो सुनी कर जाती है यह सुनामी की लहरे ??????????
लेखक
पंकज दुबे
पत्रकार
मुंबई
सुनामी जो अपने नाम से ही बड़ा जाना पहचाना सा लगता है जिसके आने के बाद पूरा बुचाल ही नही मच जाता है बल्कि प्रकितिक का तहस- नहस तक हो जाता है यह तीन अक्षरों का नाम ना जाने कितनी बार तबाही मचाया है, जैसा की सुनामी जापान भाषा का शब्द है ,जो दो शब्दों त्सु (tsu) और नामी(nami ) से मिलकर बना है ऐसे इसे भैगोलिक रूप मे ज्वारीय धराये (tidal waves ) भी कहा जाता है,सुनामी आने की कुछ खास वजह तब मानी जाती है जब समुद्री क्षेत्र मे पृथ्वी की सतह के निचे पड़ी हुयी तक्तोनिक पलेट्स मे जोरदार हलचल होने लगती है और इस हलचल से वहा के जगहों मे बदलाव होने लगता है जिससे आपसी टकराव पैदा होने लगती है और इस टकराव से एक जोर की तीब्र उर्जा पैदा होती है जो समुद्री भूकंप का एक ब्यापक रूप धारण ग्रहण कर लेती है जिसके बाद समुद्री क्ष्तेरो मे उची- उची लहरे उठनी लगती है और जो सुनामी बनकर लाखो करोडो जान -माल पर कहर डाल देती है
तथा इसके आलावा ज्वालामुखी विस्फोट और भूस्खलन भी सुनामी की कुछ हद तक वजह मानी जाती है अब ये लहरे किसी महादिव्प के किनारे छोर पर उठे तो पानी अपने मूल अस्तर से दूर तक फ़ैल जाता है और काफी नुकसान पहुचाने लगता है
११मार्च ,२०११ को जापान के उत्तरी -पूर्वी इलाको मे भूकंप के बाद जापान मे जबरदस्त सुनामी ने अपना कहर गिराया जिसे सायद है कोई भूल पायगा. इससे पहले जापान मे सन १९०० मे भूकंप आया था जो विश्व का पाचवा बड़ा भूकंप मना गया था जिसकी तीब्रता रिक्टर पैमाने पर ८.९ मापी गयी थी सुनामी आने मे सबसे बड़ा रोल भूकंप का रहता है सिस्मोमीटर के माद्यम से भूकंप की तीब्रता को मापा जाता है जिसे सिस्मोग्राफी कहते है, 3 से कम रिक्टर की तीब्रता के भूकंप को सामान्य तौर पर माना जाता है जबकि ७ रिक्टर की ज्यादा तीब्रता को घम्भीर भूकंप माना जाता है और सुनामी की लहरों की रफ़्तार ४०० की. मी प्रति घंटे तक हो सकती है और समुद्र की लहरों की उचाई ३० फीट से भी जय्दा उठ सकती है ,अब कारन चाये भूकंप हो या सुनामी पर जब इनका कहर मानवो जीवन पर पड़ता है तो ना जाने कितने जान- माल का कोहराम देखने को मिलता है और लाख वैज्ञानिक उप्लाभ्धिया के बावजूद हमें बस संतोष है करना पड़ता है और फ्हिर व्ही पूरानी कहावतो पर सोचना पड़ता है की "आधी आवो तो बैठ गवाए " लेकिन जिन्दगी तो सुनी कर जाती है यह सुनामी की लहरे ??????????
लेखक
पंकज दुबे
पत्रकार
मुंबई
Posts by : Admin
अनशन ही अनशन क्यों ???????
आजकल हर कोई एक ही दर्रे पर चल रहा है, जिसको देखो व्ही अपना रहा है, हर जगह इसकी ही जबान चल रही है , हर कोई इसको ही अपना लोहा मान रहा है ,और बस इसकी आड़ ले कर अपने सारे काम मनवाने की लाख कोशिश कर रहा है, क्या यह कोई रामबाण बनगया है ... हां आज के यूग यानि कलयूग का बाण और वह है अनशन .यही है जो आजकल खूब अपना नाम कमा रहा है, जहा भी देखो इनकी ही धूम है आजकल लोग बाबा रामदेव का योग भूल कर इनकी छत्र छाया में जा बस रहे है ... जैसा की पहले से ही भारत देश के लिए यह एक सशक्त माद्यम रहा है हमारे राष्ट पिता महात्मा गाँधी अहिंसा के पाठ में इस नियम को सबसे ज्यादा सशक्त मानते थे... उनका कहना था की कोई जब तुमारे गाल पर एक तमाचा मारे तब तुम अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो उसे स्व; ही ज्ञान हो जायगा .भारत देश अपनी आजादी की लडाई के लिए इस माद्यम को न जाने कितनी बार आजमा चूका है और काफी हद तक यह सत्य भी है.... पर आज ना तो अग्रेज है और ना ही गुलामी तो फ्हिर क्यों यह आन्दोलन ..क्या आपने ही लोगो से दबाये जा रहे है या लोग अपनी आजादी को पचा नही पा रहे है जो आए दिन उलटिया किये जा रहे है .. आज हर कोई अपनी बात कहनेके लिए अनशन पर बैठ जा रहा है और प्रशासन बस गाये -बगाहे बयान बाजी पर लगा है... अब एक समस्या हल नही होती की दूसरी तैयार हो जा रही है क्या सब जिम्मेदारी सरकार की होती है सरकार अच्छा करे तो नाराज- बुरा करे तो नाराज ...आखिरकार में कहना ही पड़ेगा की हम कोई भगवान् नही है जो जादू की छड़ी धुमाया और समस्या हल हो गयी ...अब अन्ना हजारे जो अपने जीवन के सुरुवाती दौर से ही आन्दोलन के माद्यम से चर्चा मे रहा करते है उन्होंने जन लोकपाल विधेयक पर काफी बड़ा अनशन रखा और उन्हें यूवाओ की तरफ से काफी समर्थन भी मिला ...सरकार उनकी बात को नजर अंदाज नही कर सकी और उनकी जीत हुयी .. अब एयेर इण्डिया के कर्मचारी जो कई बार अनशन पर जा चुके है ....रेलवे कर्मचारी जो बार -बार अपनी मागो को लेकर सरकार को चेताया करते है ..और अब डाक्टर की पढाई पड़ रहे विद्यार्थी जो बत्तो को लेकर महारास्ट सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ गये है ..क्या आन्दोलन करने वालो को य ह नही पता की कितना नुकसान हो रहा है इस आन्दोलन से ... पर पता हो भी तो क्या हर कोई अपनेलिए लड़ रहा है और उसे एक ससक्त माद्यम चाहिए जो है आन्दोलन ...ना जाने कितनेऔर लोग है जो किसी ना किसी समस्या से जूझ रहे है लेकिन जीवन को एक संघर्स मानकर आगे बड़ने की जी तोड़ कोशिश कर रहे है ना जाने कितनी बार मंदी की आड़ मे नौकरी से निकाले गये ...कितने लोग मीडिया की राह मे बेबस होकर काम कर रहे है जो दुसरे का माद्यम बनते है वही अपने जीवन के हालात को जुबा पर नही ला पाते है जिन्हें समाज का चौथा स्तम्ब कहा जाता है उनकी बात का कोई रूप नही बन पाता है ....क्या सार्वजनिक क्षेत्रो के लोग ही अपने काम के प्रति पूरी इमानदारी दिखाते है क्या सरकारी क्षेत्र के लोग ही अनशन के मार्ग पर जा सकते है ...... समस्या को सुलझाने से हल होती है चिल्लाने से व आन्दोलन से नही ... आन्दोलन को उही सहज ना समझे.. नही तो सायेद ही आनेवाले भविष्य के पास कोई विकल्प मौजूद होगा ........
पंकज दुबे
पत्रकार
मुंबई .
आजकल हर कोई एक ही दर्रे पर चल रहा है, जिसको देखो व्ही अपना रहा है, हर जगह इसकी ही जबान चल रही है , हर कोई इसको ही अपना लोहा मान रहा है ,और बस इसकी आड़ ले कर अपने सारे काम मनवाने की लाख कोशिश कर रहा है, क्या यह कोई रामबाण बनगया है ... हां आज के यूग यानि कलयूग का बाण और वह है अनशन .यही है जो आजकल खूब अपना नाम कमा रहा है, जहा भी देखो इनकी ही धूम है आजकल लोग बाबा रामदेव का योग भूल कर इनकी छत्र छाया में जा बस रहे है ... जैसा की पहले से ही भारत देश के लिए यह एक सशक्त माद्यम रहा है हमारे राष्ट पिता महात्मा गाँधी अहिंसा के पाठ में इस नियम को सबसे ज्यादा सशक्त मानते थे... उनका कहना था की कोई जब तुमारे गाल पर एक तमाचा मारे तब तुम अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो उसे स्व; ही ज्ञान हो जायगा .भारत देश अपनी आजादी की लडाई के लिए इस माद्यम को न जाने कितनी बार आजमा चूका है और काफी हद तक यह सत्य भी है.... पर आज ना तो अग्रेज है और ना ही गुलामी तो फ्हिर क्यों यह आन्दोलन ..क्या आपने ही लोगो से दबाये जा रहे है या लोग अपनी आजादी को पचा नही पा रहे है जो आए दिन उलटिया किये जा रहे है .. आज हर कोई अपनी बात कहनेके लिए अनशन पर बैठ जा रहा है और प्रशासन बस गाये -बगाहे बयान बाजी पर लगा है... अब एक समस्या हल नही होती की दूसरी तैयार हो जा रही है क्या सब जिम्मेदारी सरकार की होती है सरकार अच्छा करे तो नाराज- बुरा करे तो नाराज ...आखिरकार में कहना ही पड़ेगा की हम कोई भगवान् नही है जो जादू की छड़ी धुमाया और समस्या हल हो गयी ...अब अन्ना हजारे जो अपने जीवन के सुरुवाती दौर से ही आन्दोलन के माद्यम से चर्चा मे रहा करते है उन्होंने जन लोकपाल विधेयक पर काफी बड़ा अनशन रखा और उन्हें यूवाओ की तरफ से काफी समर्थन भी मिला ...सरकार उनकी बात को नजर अंदाज नही कर सकी और उनकी जीत हुयी .. अब एयेर इण्डिया के कर्मचारी जो कई बार अनशन पर जा चुके है ....रेलवे कर्मचारी जो बार -बार अपनी मागो को लेकर सरकार को चेताया करते है ..और अब डाक्टर की पढाई पड़ रहे विद्यार्थी जो बत्तो को लेकर महारास्ट सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ गये है ..क्या आन्दोलन करने वालो को य ह नही पता की कितना नुकसान हो रहा है इस आन्दोलन से ... पर पता हो भी तो क्या हर कोई अपनेलिए लड़ रहा है और उसे एक ससक्त माद्यम चाहिए जो है आन्दोलन ...ना जाने कितनेऔर लोग है जो किसी ना किसी समस्या से जूझ रहे है लेकिन जीवन को एक संघर्स मानकर आगे बड़ने की जी तोड़ कोशिश कर रहे है ना जाने कितनी बार मंदी की आड़ मे नौकरी से निकाले गये ...कितने लोग मीडिया की राह मे बेबस होकर काम कर रहे है जो दुसरे का माद्यम बनते है वही अपने जीवन के हालात को जुबा पर नही ला पाते है जिन्हें समाज का चौथा स्तम्ब कहा जाता है उनकी बात का कोई रूप नही बन पाता है ....क्या सार्वजनिक क्षेत्रो के लोग ही अपने काम के प्रति पूरी इमानदारी दिखाते है क्या सरकारी क्षेत्र के लोग ही अनशन के मार्ग पर जा सकते है ...... समस्या को सुलझाने से हल होती है चिल्लाने से व आन्दोलन से नही ... आन्दोलन को उही सहज ना समझे.. नही तो सायेद ही आनेवाले भविष्य के पास कोई विकल्प मौजूद होगा ........
पंकज दुबे
पत्रकार
मुंबई .
Sunday, 3 July 2011
Posts by : Admin
निर्भीक आवाज़: कोख़ में सुलगती ज़िन्दगी
निर्भीक आवाज़: कोख़ में सुलगती ज़िन्दगी: " सरलता में महानता कठिन और दुर्लभ होती है, लेकिन माँ के चरित्र में ये दोनों सहजता से एक साथ दिखाई देता है .......स्त्रियों का जीवन कई परी..."
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